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Tenali Ramakrishna Stories

Tenali Raman Stories in Hindi

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दोस्तों, कई बार जो बात हमें बड़े-बड़े तर्क नहीं समझा पाते वो एक छोटी सी कहानी समझा जाती है. ऐसी ही प्रसिद्ध tenali raman stories का संग्रह हम आपके लिए लेके आये हैं जो हमारी life में चल रही कोई न कोई problem का आसान solution provide करती हैं. I am sure, आपको ये tenali ramakrishna stories बेहद पसंद आएँगी और आपकी Life को Positive बनाने में काफी मदद करेंगी. Happy reading.( ͡° ͜ʖ ͡°)

कौन थे तेनाली रामा ? who was Tenali Raman

तेनालीराम (Tenali Raman) जिनका पूरा नाम गरालपति रामाकृष्णा शर्मा था उनका जन्म 16th century में भारत के आन्ध्रप्रदेश के थुमुलुरु नामक गाँव में, एक तेलुगू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। तेनालीराम के पिता गरालपति रामैया, तेनाली नगर के रामलिंगेस्वरस्वामी मंदिर में पुजारी थे।

जब तेनाली रामा बहुत छोटे थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था.जिसके पश्चात उनकी माता लक्षम्मा, उनको लेकर अपने भाई के यहां चली गई और वही रहने लगीं। रामाकृष्णा अपने मामा के ही बड़े हुये और बाद में रामाकृष्णा के नाम से जाने जाने लगे। तेनालीराम पेशे से कवि थे।

वे विजय नगर के महाराज कृषणदेव राय के दरबार में नियुक्त थे ,वे एक चतुर, बुद्विमान व्यक्ति थे और साथ ही बड़े हाज़िर जवाब भी थे, उनके आगे तोह राजा भी हर मान जाते थे वे अपनी सूझबूझ और चतुराई से, बड़ी से बड़ी मुश्किल को आसानी से चुटकियो में हल कर देते थे |

वे राजा के बहुत प्रिय, भरोसेमंद और सराहनीय मित्रो में से थे | यह हम तेनालीराम व कृष्णदेव राय की कुछ रोचक कहानियाँ प्रस्तुत कर रहे है इन सभी कहानियों में तेनालीराम ने अपनी चतुराई के साथ-साथ अपने उदार व्यक्तित्व का भी ज्ञान कराया है। आशा करते है की आप पुनः इन्हे पढ़कर आनंदित होंगे |

Tenali raman stories in hindi #1

तेनालीरामा की कहानी: अंगूठी चोर (Tenali Rama Story: The Lost Ring)

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Tenali Ramakrishna Stories:- राजा कृष्ण देव राय एक कीमती रत्न जड़ित अंगूठी पहना करते थे। राजा जब भी वह दरबार में उपस्थित होते तब उनकी नज़र अक्सर अपनी सुंदर अंगूठी पर जाकर टिक जाया करती थी। राजमहल में आने वाले अतिथिगण और मंत्रीगणों से बार-बार अपनी उस अंगूठी का ज़िक्र किया करते थे।

एक दिन राजा की अंगूठी कही खो जाती है राजा अंगूठी खूब ढूढवाता है किन्तु अंगूठी नहीं मिलती  तब राजा बहुत परेशान हो जाता है | जब राजा कृष्ण देव राय उदास होकर अपने सिंहासन पर बैठे थे तभी वहाँ तेनाली रामा (Tenali Raman)आ पहुंचे है और राजा से उनकी उदासी का कारण पूछते है । तब राजा उनको बताता है कि उनकी पसंदीदा अंगूठी कही खो गयी है,और उन्हे शक है कि उनके बारह अंगरक्षकों में से ही किसी एक ने उसे चुराया है।

चूँकि राजा कृष्ण देव राय का सुरक्षा घेरा इतना चाक-चौबंद होता था की कोई चोर तो दूर की बात है कोई बाहर का व्यक्ति भी उनके नज़दीक नहीं जा सकता था।

तेनालीराम राजा से कहता है – मैं अंगूठी चोर को बहुत जल्द पकड़ लूँगा। यह सुन राजा कृष्ण देव राय बहुत प्रसन्न हुए और उन्होने तुरंत अपने अंगरक्षकों को वहाँ बुलवा लिया।

 तेनालीराम अंगरक्षकों से बोले, “राजा की अंगूठी आप में  से ही किसी एक ने चोरी की है और मैं इसका पता बड़ी आसानी से लगा लूँगा।

जो सच्चा है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं और लेकिन जो चोर है उसे बक्शा नहीं जायेगा वह कठोर दण्ड भोगने के लिए तैयार हो जाए।”

तेनालीराम ने बोला “आप सब को मेरे साथ काली माँ के मंदिर जाना है।”

राजा हैरान होकर बोले, ” ये क्या है  तेनालीराम , हमें चोर का पता लगाना है मंदिर के दर्शन नहीं करने !”

तेनाली राम राजा से बोले – “महाराज, आप मुझ पर विश्वास रखिये जल्द ही चोर का पता चल जाएगा ”।

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मंदिर पहुँच कर तेनाली रामा (Tenali Raman) पुजारी के पास गए और उन्हें कुछ निर्देश दिए।

इसके बाद उन सब अंगरक्षकों से कहा, ” आप सबको बारी-बारी से मंदिर में जाकर मां काली की मूर्ति के पैर छूने हैं और फ़ौरन बाहर निकल आना है। ऐसा करने से माँ काली आज रात स्वप्न में आकर मुझे उस चोर का नाम बता देंगी।

अब सारे अंगरक्षक बारी-बारी से मंदिर में जा कर माता के पैर छूने लगे। और जैसे ही कोई अंगरक्षक पैर छू कर बाहर निकलता तेनाली रामा (Tenali Raman) उसका हाथ सूंघते और एक कतार में खड़ा कर देते। कुछ ही देर में सभी अंगरक्षक एक कतार में खड़े हो गए।

महाराज बोले, “चोर का पता तो कल सुबह ही लगेगा, तब तक इनका क्या किया जाए तेनाली ?”

तेनाली बोले नहीं महाराज, चोर का पता तो लग चुका है। सातवें स्थान पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।

ऐसा सुनते ही वह अंगरक्षक वहाँ भागने लगा, पर वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया, और कारागार में डाल दिया.

राजा और बाकी सभी लोग हैरान थे कि तेनालीराम ने बिना स्वप्न देखे ही कैसे पता कर लिया कि चोर वही है।

तेनाली रामा (Tenali Raman) सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोले,”मैंने पुजारीजी से कहकर काली मां के पैरों पर तेज़ सुगन्धित इत्र छिड़कवा दिया था। जिस कारण जिसने भी माँ के पैर छुए उसके हाथ में वही सुगन्ध आ गयी। लेकिन जब मैंने सातवें अंगरक्षक के हाथ सूंघे तो उसके हाथ में वो खुशबु नहीं थी…

उसने पकड़े जाने के डर से माँ काली की मूर्ति के पैर छूए ही नहीं। इसलिए यह साबित हो गया की उसी के मन में पाप था और वही चोर है।”

So this is the climax of tenali raman stories

महाराज बोले, “चोर का पता तो कल सुबह ही लगेगा, तब तक इनका क्या किया जाए तेनाली ?”

तेनाली बोले नहीं महाराज, चोर का पता तो लग चुका है। सातवें स्थान पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।

ऐसा सुनते ही वह अंगरक्षक वहाँ भागने लगा, पर वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया, और कारागार में डाल दिया.

राजा और बाकी सभी लोग हैरान थे कि तेनालीराम ने बिना स्वप्न देखे ही कैसे पता कर लिया कि चोर वही है।

तेनाली रामा (Tenali Raman) सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोले,”मैंने पुजारीजी से कहकर काली मां के पैरों पर तेज़ सुगन्धित इत्र छिड़कवा दिया था। जिस कारण जिसने भी माँ के पैर छुए उसके हाथ में वही सुगन्ध आ गयी। लेकिन जब मैंने सातवें अंगरक्षक के हाथ सूंघे तो उसके हाथ में वो खुशबु नहीं थी…

उसने पकड़े जाने के डर से माँ काली की मूर्ति के पैर छूए ही नहीं। इसलिए यह साबित हो गया की उसी के मन में पाप था और वही चोर है।” 

राजा कृष्ण देव राय एक बार फिर tenali raman की बुद्धिमत्ता के कायल हो गए। और उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से सम्मानित किया।

Tenali raman stories in hindi #2

तेनालीराम और अरबी घोड़े | The Tenali Rama And The Arab Horse

एक दिन एक अरब प्रदेश का व्यापारी अपने घोड़े बेचने महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में आता है। वह अपने घोड़ो का इतना बखान करता है के महाराज कृष्णदेव राय उसकी बातो में आकर सारे घोड़े खरीदने के लिए राजी हो जाते है ।

अब राजा के घुड़साल इतने अधिक घोड़े हो जाते हैं कि उन्हें रखने की जगह ही नहीं बचती, इसलिए महाराज आदेश देते है की बहुत से घोड़ों को विजयनगर के नागरिकों और राजदरबार के कुछ लोगों को तीन महीने तक देखभाल के लिए दे दिया जाये । हर एक देखभाल करने वाले व्यक्ति को घोड़ों के पालन खर्च और प्रशिक्षण के लिए प्रति माह एक सोने का सिक्का दिया जायेगा।

विजयनगर के सभी नागरिकों के साथ साथ चतुर तेनालीराम को भी एक घोडा दिया गया। तेनालीराम ने घोड़े को अपने घर के पिछवाड़े एक छोटी सी घुड़साल बना कर बांध देता है और हर रोज घुड़साल की नन्ही खिड़की से उसे थोड़ी मात्रा में चारा देने लगता है।

बाकी सब लोग भी राजा के आदेश को निभाने लगते है और राजा नाराज ना हो जाए और उन्हें कोई दंड ना दे दें; इस दर से अपना पेट काट-काट कर भी घोड़े को अच्छी किस्म का चारा खरीद कर खिलाने लगते है ।

ऐसा करते-करते तीन महीने बीत जाते हैं और राजा के कहे अनुसार तीन महीने बाद सारे नागरिक घोड़ो को ले कर राजा कृष्णदेव राय के समक्ष इकठ्ठा हो जाते हैं। पर तेनालीराम खाली बिलकुल हाथ आते हैं। राजगुरु तेनालीराम के घोड़ा ना लाने का कारण पूछते है। तब तेनालीराम कहते है कि घोड़ा इतना बिगडैल और खतरनाक हो चुका है, की वह खुद ही उस घोड़े के समीप नहीं जाना चाहते ।

राजगुरु, राजा को कहते है की तेनालीराम झूठ बोल रहा है। राजा कृष्णदेव राय असलियत का पता लगाने के लिए राजगुरु को तेनालीराम के साथ भेजते हैं।

तेनालीराम के घर के पीछे बनी छोटी सी घुड़साल देख राजगुरु गुस्से से कहते है कि अरे मूर्ख तुम इतनी छोटी सी कुटिया को घुड़साल कहते हो?

तब तेनालीराम बड़ी ही चतुराई से राजगुरु से कहते है के क्षमा करें मैं आप की तरह विद्वान नहीं हूँ न। आप कृपया कर पहले घोड़े को खिड़की से झाँक कर तो  देख लीजिए और उसके पश्चात ही अंदर कदम रखियेगा |

राजगुरु जैसे ही खिड़की से अंदर झाँकते हैं, घोडा लपक कर उनकी दाढ़ी पकड़ लेता है। और काफी मशक्कत करने के बाद भी भूखा घोड़ा राजगुरु की दाढ़ी नहीं छोड़ता है। तब कुटिया तोड़ कर तेज हथियार से राजगुरु की दाढ़ी काट कर उन्हे घोड़े के चंगुल से आजाद कराया जाता है। परेशान राजगुरु और चतुर तेनालीराम भूखे घोड़े को ले कर राजा के दरबार में पहुँचते हैं।

घोड़े की दुबली-पतली हालत को देख कर राजा जी तेनालीराम से इसका कारण पूछते हैं तो तेनालीराम कहते है कि मैं घोड़े को प्रति दिन थोड़ा सा चारा ही दिया करता था, जिस तरह आप की गरीब प्रजा आपका आदेश का करने के लिए खुद थोड़ा भोजन कर के गुजारा करती है और घोड़ो को संभालने के बोझ से त्रस्त है। उसी प्रकार आवश्यकता से कम भोजन मिलने के कारण घोडा बिगड़ेल हो गया।

राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना होता है न की उन पर अधिक बोझ डालना होता है । आपके दिये हुए आदेश से घोड़े तो बलवान हो गए किन्तु आप की प्रजा दुर्बल हो गयी। महाराज कृष्णदेव राय को तेनालीराम की समझ के फिर कायल हो गयी और वह तेनालीराम की प्रसंशा करते हुए उन्हे पुरस्कार देते है।

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